हिन्दी
हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। देश के संगठन,
विकास और सांस्कृतिक संवर्धन में हिन्दी का बहुमूल्य योगदान हे । मेरा परिवार आरंभ
से ही हिन्दी के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित रहा है । मेरे पिताजी स्व.सेठ
गोविन्ददास भारतीय संसद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में सबसे आगे
थे । शैशव काल से ही हिन्दी के प्रति मेरा प्रबल अनुराग रहा है । मेरा दृढ विश्वास
है कि हिन्दी के समुचित सम्मान से राष्ट्र की सांस्कृतिक समृद्धि, अखंडता,
भावनात्मक एकता और प्रतिष्ठा में विकास होगा ।
राष्ट्र भाषा हिन्दी
हिन्दी नहीं राष्ट्र की अपनी केवल बोली भाषा
व्यक्त इसी में होती अपनी संस्कृति की परिभाषा
दुहिता
दिव्य देवभाषा की शुभ सुमेरु भाषा-माला की
कोटि-कोटि
जन करें आरती जैसे किसी देवबाला की
आदिकाल
से वर्तमान तक हिन्दी का इतिहास मनोहर
रक्षित
है भारत की इसमें संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर
आए
प्रबल प्रभंजन कितने कर विचलित अस्तित्व हमारा
जोड़
सभी को एकसूत्र में हिन्दी बनी चेतना धारा
कला,
संस्कृति दर्शन सर्जन की हिन्दी राष्ट्रीय निधान
लख
असीम ऐश्वर्य अबाधित हम को होता है अभिमान
मीरा,
सूर, कबीरा, तुलसी नानक नामदेव की वाणी
प्रवहमान
जनमन की गंगा मधुमय पूत गिए कल्याणी
राष्ट्रपिता
नेहरु, सुभाष, गोविंद, प्रभृत व्रतधारी
पूजा
करते रहे तुम्हारी सादर बनकर प्रेम पुजारी
आज
विश्व के विशद पटलपर है साम्राज्य तुम्हारा
विमल
प्राच्य विद्या आकांक्षी आकर्षित जग सारा
भारत
माता के लिलार की चंदन कुंकुम बिंदी
स्वाभिमान
संस्कृति की भाषा राष्ट्र भारती हिन्दी
(श्रीमती
पद्मा
बिनानी की 75 कविताओं के संकलन परिवृत्त
से )