Sunday, November 10, 2019

स्मरणीय संस्मरण -“कर्मयोग के पथिक” में से



मैं “कर्मयोग के पथिक” लिखने बैठी और अनायास मेरे मानस पर वह परिदृश्य आ गया जब मैं कलकत्ता स्थित स्ट्रेण्ड रोड घर में अवस्थित हुई थी ।

इन पचास वर्षो के अन्तराल ने यादों के इस शहर के न जाने कितने घरों को ध्वस्त कर दिया है । वक्त बनाता भी है, वक्त मिटाता भी है । वक्त यदि बहुत सारी स्मृतियों को न मिटाता तो इन्सान के न जाने कितने जख्म हरे के हरे रह जाते । हम अवशेषों का उपभोग करते हैं, यही सृष्टि की नियति है । प्रत्येक परिवर्तन को यदि झॉककर देखें तो उसका पुरातन स्वरूप सामने आ जाएगा ।

(पद्मा बिनानी लिखित स्मरणीय संस्मरण -“कर्मयोग के पथिक” से)


राष्ट्र के गौरव मेरे पिताजी श्रद्धेय पिताश्री सेठ गोविन्द दासजी


राष्ट्र के गौरव मेरे पिताजी श्रद्धेय पिताश्री सेठ गोविन्द दासजी

हमारे पिताश्री सेठ गोविंद दासजी का उदात्त जीवन स्वयं में ही उनका परिचय है । वे देश के उन सपूतों में से एक थे जिनकी प्रत्येक सांस देश और समाज को अर्पित हो गयी । जब राष्ट्र के लिये सर्वस्व न्यौछावर करने की घड़ी आयी तो वे अग्रिम पंक्ति मे थे, किंतु सत्ता सुख की तृष्णा से सदैव मुक्त रहे ।


कलम के सिपाही, सिपाही वतन के
कर्म ऐसा, प्रेरणा बने सारे जन के
कहीं थे भ्रमर पुष्प साहित्य के तो
कहीं बागवां इस महकते चमन के

(पद्मा बिनानी द्वारा लिखित 
 संस्मरण  “नर्मदा के तट से”)


घर एक मंदिर


मुझे यह  घर जो अब मेरा प्राण एवं मंदिर सा ही लगा, इसे देखकर मेरे भावुक मन में काव्यात्मक भाव जाग उठे ।

यह शान्ति का एक उपवन था
यह सपनो का एक कानन था
कर्मयोग की खुशबू इसमें
कोना कोना मन भावन था
पिता पुत्र के कर कमलों से
सजा हुआ था घर आंगन
साधक और यति जैसा ही
था इनका अपना जीवन
यम नियम से बन्धा हुआ था
तिनका तिनका चर, अचर
यही था मेरा मंदिर भी
ऐसा था वह मेरा घर

(पद्मा बिनानी लिखित स्मरणीय            संस्मरण -“कर्मयोग के पथिक” से)

दुर्गा हुई साकार


इस देश की वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती का नाम अमर है । मातृंभूमि की अस्मिता और भारतीय नारी के स्वाभिमान की रक्षा हेतु दुश्मनों से युद्ध करती हुई उन्होंने जिस शौर्य और साहस के साथ अपने प्राणों की आहूति दी थी वह सदैव याद किया जायेगा। रानी दुर्गावती पर लिखी गयी कविता का एक सम्पादित अंश ।

दुर्गा हुई साकार जिसमें,थी वही दुर्गावती
सौम्य,कोमल पुष्प सी, पर्वत सी, पर दुर्गम अति,
थरथराते शुत्र थे, जब थी कभी ललकारती ।
घोर संकट में कभी हिम्मत न थी जो हारती ।
कुलवधू वह गोंड़ वंश की, राष्ट्र की वीरांगना,
मुगलों के मंसूबों को करके ध्वस्त स्वयं हो गई फना ।

(पद्मा बिनानी लिखित पुस्तक- नर्मदा के तट से)


Thursday, September 12, 2019

राष्ट्र भाषा हिन्दी


हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। देश के संगठन, विकास और सांस्कृतिक संवर्धन में हिन्दी का बहुमूल्य योगदान हे । मेरा परिवार आरंभ से ही हिन्दी के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित रहा है । मेरे पिताजी स्व.सेठ गोविन्ददास भारतीय संसद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में सबसे आगे थे । शैशव काल से ही हिन्दी के प्रति मेरा प्रबल अनुराग रहा है । मेरा दृढ विश्वास है कि हिन्दी के समुचित सम्मान से राष्ट्र की सांस्कृतिक समृद्धि, अखंडता, भावनात्मक एकता और प्रतिष्ठा में विकास होगा ।

राष्ट्र भाषा हिन्दी

हिन्दी नहीं राष्ट्र की अपनी केवल बोली भाषा
व्यक्त इसी में होती अपनी संस्कृति की परिभाषा
दुहिता दिव्य देवभाषा की शुभ सुमेरु भाषा-माला की
कोटि-कोटि जन करें आरती जैसे किसी देवबाला की
आदिकाल से वर्तमान तक हिन्दी का इतिहास मनोहर
रक्षित है भारत की इसमें संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर
आए प्रबल प्रभंजन कितने कर विचलित अस्तित्व हमारा
जोड़ सभी को एकसूत्र में हिन्दी बनी चेतना धारा
कला, संस्कृति दर्शन सर्जन की हिन्दी राष्ट्रीय निधान
लख असीम ऐश्वर्य अबाधित हम को होता है अभिमान
मीरा, सूर, कबीरा, तुलसी नानक नामदेव की वाणी
प्रवहमान जनमन की गंगा मधुमय पूत गिए कल्याणी
राष्ट्रपिता नेहरु, सुभाष, गोविंद, प्रभृत व्रतधारी
पूजा करते रहे तुम्हारी सादर बनकर प्रेम पुजारी
आज विश्व के विशद पटलपर है साम्राज्य तुम्हारा
विमल प्राच्य विद्या आकांक्षी आकर्षित जग सारा
भारत माता के लिलार की चंदन कुंकुम बिंदी
स्वाभिमान संस्कृति की भाषा राष्ट्र भारती हिन्दी

(श्रीमती पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से )

Wednesday, September 11, 2019

मेरे सपनों का शहर - जबलपुर


मैं जबलपुर को जब इतिहास के आईनें में देखने का प्रयास करती हूँ, तो साहित्य मेरी ओर कातर दृष्टि से देखने लगता है । और जब साहित्य की किरणों में इसका मोहक स्वरुप विकीर्ण होता है, तो इतिहास के ढेर सारे पन्ने, स्वाभिमान से फड़फड़ा उठते हैं । तब प्राचीन संस्कृति भी कहीं से रहस्यमयी मुस्कान बिखेरती प्रतीत होती है, जैसे मेरे मानस ने उसे विस्मृत कर दिया हो । जब इन सभी को मैं समभाव से देखती हूँ तो स्वाधीनता संग्राम का वह युग मुझे वह सब कुछ याद दिलाने लगता है,जहाँ जबलपुर की अपनी एक विशेष भूमिका रही थी, तथा जिस युग के कुछ अध्यायों को मेरे बचपन ने स्वयं अपनी बाल सुलभ दृष्टि से देखा था ।
     स्थान भी सदैव काल और पात्र से प्रभावित रहे हैं । आज का आधुनिक जबलपुर शहर कभी तेजस्वी ऋषि जाबालि के आश्रम के लिए प्रसिद्ध था तथा ऐसी लोकमान्यता है कि उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम जाबालिपुर हुआ । “जबलपुर” इसका ही अपभ्रंश है ।

मेरे सपनों का शहर - जबलपुर

उस शहर को क्या कहें
जिसका ये ठाट बाट
स्वर्ग धरती पर लगे
ऐसा ही भेड़ा घाट ।
और बन्दर कूदनी
की भी निराली शान
लांघने आये इसे भी
क्या कभी हनुमान? 
मरमरी है फर्श जिसका,
है वो धुआँधार ।
चाँद का टुकड़ा गिरा
या चाँदनी का चन्द्रहार 
नर्मदा का नृत्य और
संगीत लहरों का ।
है महाकवि ये तो ।
भारत के शहरों का । 
दे गया है कौन इतना ?
शहर को उपहार
जन्म भूमि को नमन है
मेरा बारंबार । 

(विदुषी लेखिका श्रीमती पद्मा बिनानी के पचास वर्ष पूर्व का रोचक और प्रेरक संस्मरण ग्रंथ        नर्मदा के तट से)

Monday, September 9, 2019

वंशीस्वर का गान कहाँ है ?


आज के वातावरण में पुराने मूल्य निरंतर टूट रहें हैं । हमारी उदात्त संस्कृति,परस्पर प्रेम त्याग की भावना और आस्तिक आस्था का लोप होता जा रहा है । इसीलिए जीवन की वास्तविक शांति और मानसिक सुख भी हमसे दूर होता जा रहा है । आज न तो पुरानी धार्मिक आस्था हैं, और न ही सामाजिक सुख। इस कविता में इसी संदर्भ को उभारते हुए कवयित्रीने लुप्त होती सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है ।


वंशीस्वर का गान कहाँ है ?
 
विश्ववंद्य भारत की अनुपम,
गरिमामय पहचान कहाँ है ?
वैदिक ऋषियों से अनुशासित
गौतम  गांधी  से   परिभाषित
आत्मतत्व के प्रति संकल्पित
त्याग  तपस्या  सेवा  पालित
विश्वनेत्री संस्कृति का वह,
गौरवमय अभिमान कहाँ है ?

विश्व धर्म का नित प्रतिपालक
विश्व  संस्कृति का  उन्नायक
विश्व  मनुजता  का  विश्वासी
राम-कृष्ण-गौरव का  गायक
चिरपोषित उज्ज्वल परंपरा का 
वांछित परिणाम कहां है ?

जन कल्याणी यज्ञ साधन
मंत्रों   में  मंगल  था  भास्वर
चारों  ओर पुण्य  परिमल था
त्राता  था   अपना   अविनश्वर
इसी धरा पर प्रेम राज्य का,
स्वर्गोपम अनुमान कहाँ है ?

शिवि दधीचि हरिचन्द सरीखी
दानशीलता   लोभग्रस्त   है
शोषण का  व्यापार  समुन्नत
मानव करुणा विकल त्रस्त है
भौतिकता की भस्म राशिपर,
आध्यात्मिक प्रतिमान कहाँ है ?

ममता  पूरित  पावन  संस्कृति
प्रीति दीप्त  उत्सव    त्योहार
नीति, सत्य जन-जन का आग्रह
करुणा  का  विकसित  व्यापार
गीता का वह ज्ञान प्रबोधन,
वंशीस्वर का गान कहाँ है ?

(पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत् से)


चरैवेति


परिर्वतन प्रकृति का नियम है, इसमें कुछ भी स्थिर नहीं । जीवन की सम-विषम स्थितियाँ आती रहती हैं। ऐसा बहुत कुछ होता है जो मनुष्य के अधिकार में नही रहता, मनुष्य के हाथ में केवल इतना ही है कि वह अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार निरंतर क्रियाशील बना रहे । इस लिए उपनिषद का आदेश है, चरैवेति अर्थात निरंतर चलते रहो ।
यह कविता इसी जीवन सत्य को उद्घाटित करती है।


चरैवेति

जलता  जीवन दीप  वर्तिका   इसकी  ज्योति  बिखेरे
आलोकित  होते    रहते  है इसमें   स्वप्न    घनेरे
उसमें  ही  प्रतिबिंब  तुम्हारा  चमक चमक   उठता  है
जैसे   निर्झर   के   प्रवाह   में   चन्द्रबिंब   बनता  है

इतना   चंचल चपल चारु   यह  चपला  की  रेखा  सा
इतना  सगा समीप,  समंजित  अभी  अभी  देखा  सा
किन्तु दूर भी इतना इसका रूप क्षणभर थिर रह पाता
जैसे  सुर  सरिता  में  कोई तारा  साफ नहीं  दिख  पाता

संध्या उषा  दिवा  रजनी में  कितने चित्र  बिगड़ते  बनते
प्रकृति  हठी, परिवर्तनकामी, चक्र  सदा चलते  ही रहते
जीवन उसका एक अंश है जिसका सत्य बिगड़ना- बनना
अपने  हाथ  यही  है  केवल  हर  स्थिति  में चलते रहना


(श्रीमती पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)


Thursday, August 15, 2019

परिवृत्त प्रस्तुत करते हुए

इन्वर्टेड कॉमा.....................................

 

किसी भी किताब को लिखते हुए या पढ़ते हुए, लेखक की ओर से या पाठक की ओर से आत्म कथ्य को लेकर जो एक प्रबल आग्रह हुआ करता है, वह परिवृत्त में भी स्वाभाविक रहा है। इस आत्म कथ्य के माध्यम से पद्मा जी ने अपने भीतर के उस तरल स्रोत की बात बहुत सच्चाई के साथ कह दी है जो इस किताब से जुड़ते हुए आपको एक अनूठी संगति प्रदान करेगी ...............

आत्म कथ्य से कुछ अंश

 

कविता से मेरा परिचय बचपन में ही हो गया था। पूज्य पिताजी (स्व. सेठ गोविन्द दास) विभिन्न विधाओं में लिखने वाले सुविख्या साहित्यकार थे। घर पर प्रायः साहित्यिक गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, शान्तिप्रिय द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामकुमार वर्मा, रामनरेश त्रिपाठी जैसे अनेक महान कवियों को देखने और सुनने का सुअवसर मुझे अपने घर में ही मिलता रहा। सुभद्रा कुमारी चौहान प्रायः मेरे घर आती थीं और अपनी रचनाओं को मेरे पिताजी ओर मेरी दीदी को सुनाती थीं। मेरी दीदी भी हिन्दी और संस्कृत में कविताएँ लिखा करती थीं। मुझे काव्य की चमत्कारिक और भावप्रवण उक्तियों में एक अनिर्वचनीय आकर्षण अनुभव होता था। 

लेखन के क्षेत्र में पदार्पण करने पर मैंने गद्य विधा को अपनाया। मेरी लिखित पुस्तकों के प्रकाशित होते रहने से गद्य विधा में लिखने के लिए प्रोत्साहन मिला। बीच-बीच में मैं कविताएँ भी लिखती रही किन्तु उन्हें सम्भालने, संजोने और प्रकाशित करने का विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। कविताएँ लिखी जाती रहीं और उनको सिलसिलेवार करने या संग्रह प्रकाशन का अवसर कहें या संयोग नहीं आया। 

मैंने अनुभव किया है कि मन की क्षुब्ध अवस्था में अनुभूतियाँ जब संवेदना से छनकर घनीभूत हो जाती हैं, तब उनका विस्तृत विवरण या विश्लेषण असम्भव होता है। यह अनुभूति भीतर एक बिम्बात्मक रूप ग्रहण करती है जिसे सृजनशील कल्पना संश्लिष्ट रूप में अभिव्यक्त करती है। मैंने यह भी अनुभव किया है कि प्रत्येक कविता अपने शिल्प अथवा अभिव्यंजक उपकरणों के साथ अवतरित होती है। रचनाकार काव्य सृजन का माध्यम होता है। 

देखा जाये तो एक पूरा जीवन की कविता में अभिव्यक्ति की अपनी ललक, रुझान और निरन्तरता का साक्षी रहा है। मैं कविताएँ लिखती गयी और वे अपने-अपने स्थानों में आवाजाही करती रहीं। इतना जरूर रहा कि मेरे स्वजनों को मेरे इस बहुत निजी से रचनात्मक या काव्यात्मक कर्म के प्रति अनभिज्ञता नहीं रही। उनको यह पता रहा कि मैं कविता में अपनी अन्तः अभिव्यक्ति का अर्थात खोजती हूँ। जब मेरी आयु 75 वर्ष हो रही थी तब परिजनों ने मुझे इस निर्णय के केन्द्र में अद्वितीय सुख के ऐसे दर्पण के सामने मुझे बैठा देने का काम किया जहाँ केवल मैं चकित होकर उस अनुभव को जी सकती थी, भावुक हो सकती थी, भावुकता में बह लगने वाले अश्रु पोंछ सकती थी, मुस्कराकर अपने भीतर के स्वप्न को पूरा होते हुए देख सकती थी। 

परिवृत्त मेरे लिए 75 वर्ष की आयु में 75 कविताओं का संग्रह या संचयन भर नहीं है बल्कि यह मेरे परिवार के उस अगाध स्नेह की थाती है जो मेरी कल्पनाओं अनुसार एक सुन्दर से पात्र में उन सबकी भावनाओं से महकता वह सुगन्धित जल है जो मेरे जीवन और स्मृतियों की झिरी से बहता रहा है। अपनी किताब को हाथ में लेकर उसे निहारना अविस्मरणीय अनुभूति है। स्वाभाविक रूप से मेरे लिए भी। मेरा उनको आशीष है जिन्होंने यह स्वप्न सच कर दिखाया। आरम्भ की एक कविता है..............

क्या भूलूँ क्या याद करूँ?

जब अतीत अपनी बाँहों में
बरबस मुझे उठा लेता है
सुधियों के गहरे सागर में
ले आकण्ठ डुबा लेता है

उस अतीत सुख की शीतलता
ऐसी है जैसी चन्दन में
सुधि सुगंध बौराई फिरती
उस अतीत के नन्दन वन में

जीवन लम्बी राह अगर तो
कंकड़ पत्थर भी बिखरे हैं
मृदुल मधुर मादक मनुहारें
कहीं अवांछित शूल भरे हैं

इतने कडुए-मीठे अनुभव
कहाँ सहेजूँ कहाँ धरूँ?
प्रश्न खड़ा हरदम रहता है
क्या भूलूँ क्या याद करूँ

(पद्मा बिनानी की 75 कविताओं के संकलन परिवृत्‍त से)


Wednesday, August 14, 2019

मनुष्‍य की मेधा

एक छोटा सा पैराग्राफ


ज्ञान और अनुभव का संसार विस्‍तीर्ण है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य के मस्तिष्‍क का आकार भले ही सीमित हो लेकिन उसकी सीमा अपार होती है। हमारे मस्तिष्‍क में स्‍मृतियों के असंख्य ण्‍ड होते हैं जिनमें सारा जीवन अत्‍यन्‍त सुव्‍यवस्थित तरीके से अवस्थित होता है। उसी मस्तिष्‍क में चलने वाली उथल-पुथल, उस सिलसिलेवार रखी स्‍मृतियों को गड्डमड्ड कर दिया करती हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहींं है कि तितर-बितर होने के बाद उनके सन्‍दर्भ ही खो जायें। यह मनुष्‍य की मेधा ही है जो समय-समय पर सभी स्‍मृतियों को, सभी बातों को,सभी घटनाक्रमों को अपने पुनस्‍मर्रण के लिए धरातल पर ले आती है। इस ब्‍लॉग के माध्‍यम से एक आरम्‍भ का प्रयत्‍न है आदरणीया पद्मा बिनानी के जीवन, स्‍मृतियों और गहन अनुभव दृष्टि की अनूठी धरोहरों को साझा करने का। 

इस एक छोटे से अनुच्छेद माध्‍यम से एक परिचय देने और अनेक परिचय प्राप्‍त करने की प्रबल जिज्ञासा के साथ हम मिल रहे हैं। आग्रह यही है कि आप इस रचनात्‍मक और अनुभवसमृद्ध सरोकार का हिस्‍सा बनेंं और हमारे साथ रहें, अपने साथ वालों को भी जोड़ें। एक सद्कामना के साथ हम निरन्‍तर मिलते रहेंगे। 

आपकी दुआऍं, शुभकामनाऍं और संगति हमेशा रहेगी, इसी विश्‍वास के साथ.........