मुझे
यह घर जो अब मेरा प्राण एवं मंदिर सा ही
लगा, इसे देखकर मेरे भावुक मन में काव्यात्मक भाव जाग उठे ।
यह सपनो का एक कानन था
कर्मयोग की खुशबू इसमें
कोना कोना मन भावन था
पिता पुत्र के कर कमलों से
सजा हुआ था घर आंगन
साधक और यति जैसा ही
था इनका अपना जीवन
यम नियम से बन्धा हुआ था
तिनका तिनका चर, अचर
यही था मेरा मंदिर भी
ऐसा था वह मेरा घर
(पद्मा बिनानी लिखित स्मरणीय संस्मरण -“कर्मयोग
के पथिक” से)
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