इन्वर्टेड कॉमा.....................................
किसी भी किताब को लिखते हुए या पढ़ते हुए, लेखक की ओर से या पाठक की ओर से आत्म कथ्य को लेकर जो एक प्रबल आग्रह हुआ करता है, वह परिवृत्त में भी स्वाभाविक रहा है। इस आत्म कथ्य के माध्यम से पद्मा जी ने अपने भीतर के उस तरल स्रोत की बात बहुत सच्चाई के साथ कह दी है जो इस किताब से जुड़ते हुए आपको एक अनूठी संगति प्रदान करेगी ...............
आत्म कथ्य से कुछ अंश
कविता से मेरा परिचय बचपन में ही हो गया था। पूज्य पिताजी (स्व. सेठ गोविन्द दास) विभिन्न विधाओं में लिखने वाले सुविख्या साहित्यकार थे। घर पर प्रायः साहित्यिक गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, शान्तिप्रिय द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामकुमार वर्मा, रामनरेश त्रिपाठी जैसे अनेक महान कवियों को देखने और सुनने का सुअवसर मुझे अपने घर में ही मिलता रहा। सुभद्रा कुमारी चौहान प्रायः मेरे घर आती थीं और अपनी रचनाओं को मेरे पिताजी ओर मेरी दीदी को सुनाती थीं। मेरी दीदी भी हिन्दी और संस्कृत में कविताएँ लिखा करती थीं। मुझे काव्य की चमत्कारिक और भावप्रवण उक्तियों में एक अनिर्वचनीय आकर्षण अनुभव होता था।
लेखन के क्षेत्र में पदार्पण करने पर मैंने गद्य विधा को अपनाया। मेरी लिखित पुस्तकों के प्रकाशित होते रहने से गद्य विधा में लिखने के लिए प्रोत्साहन मिला। बीच-बीच में मैं कविताएँ भी लिखती रही किन्तु उन्हें सम्भालने, संजोने और प्रकाशित करने का विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। कविताएँ लिखी जाती रहीं और उनको सिलसिलेवार करने या संग्रह प्रकाशन का अवसर कहें या संयोग नहीं आया।
मैंने अनुभव किया है कि मन की क्षुब्ध अवस्था में अनुभूतियाँ जब संवेदना से छनकर घनीभूत हो जाती हैं, तब उनका विस्तृत विवरण या विश्लेषण असम्भव होता है। यह अनुभूति भीतर एक बिम्बात्मक रूप ग्रहण करती है जिसे सृजनशील कल्पना संश्लिष्ट रूप में अभिव्यक्त करती है। मैंने यह भी अनुभव किया है कि प्रत्येक कविता अपने शिल्प अथवा अभिव्यंजक उपकरणों के साथ अवतरित होती है। रचनाकार काव्य सृजन का माध्यम होता है।
देखा जाये तो एक पूरा जीवन की कविता में अभिव्यक्ति की अपनी ललक, रुझान और निरन्तरता का साक्षी रहा है। मैं कविताएँ लिखती गयी और वे अपने-अपने स्थानों में आवाजाही करती रहीं। इतना जरूर रहा कि मेरे स्वजनों को मेरे इस बहुत निजी से रचनात्मक या काव्यात्मक कर्म के प्रति अनभिज्ञता नहीं रही। उनको यह पता रहा कि मैं कविता में अपनी अन्तः अभिव्यक्ति का अर्थात खोजती हूँ। जब मेरी आयु 75 वर्ष हो रही थी तब परिजनों ने मुझे इस निर्णय के केन्द्र में अद्वितीय सुख के ऐसे दर्पण के सामने मुझे बैठा देने का काम किया जहाँ केवल मैं चकित होकर उस अनुभव को जी सकती थी, भावुक हो सकती थी, भावुकता में बह लगने वाले अश्रु पोंछ सकती थी, मुस्कराकर अपने भीतर के स्वप्न को पूरा होते हुए देख सकती थी।
परिवृत्त मेरे लिए 75 वर्ष की आयु में 75 कविताओं का संग्रह या संचयन भर नहीं है बल्कि यह मेरे परिवार के उस अगाध स्नेह की थाती है जो मेरी कल्पनाओं अनुसार एक सुन्दर से पात्र में उन सबकी भावनाओं से महकता वह सुगन्धित जल है जो मेरे जीवन और स्मृतियों की झिरी से बहता रहा है। अपनी किताब को हाथ में लेकर उसे निहारना अविस्मरणीय अनुभूति है। स्वाभाविक रूप से मेरे लिए भी। मेरा उनको आशीष है जिन्होंने यह स्वप्न सच कर दिखाया। आरम्भ की एक कविता है..............
क्या भूलूँ क्या याद करूँ?
जब अतीत अपनी बाँहों में
बरबस मुझे उठा लेता है
सुधियों के गहरे सागर में
ले आकण्ठ डुबा लेता है
उस अतीत सुख की शीतलता
ऐसी है जैसी चन्दन में
सुधि सुगंध बौराई फिरती
उस अतीत के नन्दन वन में
जीवन लम्बी राह अगर तो
कंकड़ पत्थर भी बिखरे हैं
मृदुल मधुर मादक मनुहारें
कहीं अवांछित शूल भरे हैं
इतने कडुए-मीठे अनुभव
कहाँ सहेजूँ कहाँ धरूँ?
प्रश्न खड़ा हरदम रहता है
क्या भूलूँ क्या याद करूँ
(पद्मा बिनानी की 75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)
