मैं “कर्मयोग के पथिक” लिखने बैठी और अनायास
मेरे मानस पर वह परिदृश्य आ गया जब मैं कलकत्ता स्थित स्ट्रेण्ड रोड घर में
अवस्थित हुई थी ।
इन
पचास वर्षो के अन्तराल ने यादों के इस शहर के न जाने कितने घरों को ध्वस्त कर दिया
है । वक्त बनाता भी है, वक्त मिटाता भी है । वक्त यदि बहुत सारी स्मृतियों को न
मिटाता तो इन्सान के न जाने कितने जख्म हरे के हरे रह जाते । हम अवशेषों का उपभोग
करते हैं, यही सृष्टि की नियति है । प्रत्येक परिवर्तन को यदि झॉककर देखें तो उसका
पुरातन स्वरूप सामने आ जाएगा ।
(पद्मा बिनानी लिखित स्मरणीय
संस्मरण -“कर्मयोग
के पथिक” से)

