आज
के वातावरण में पुराने मूल्य निरंतर टूट रहें हैं । हमारी उदात्त संस्कृति,परस्पर
प्रेम त्याग की भावना और आस्तिक आस्था का लोप होता जा रहा है । इसीलिए जीवन की
वास्तविक शांति और मानसिक सुख भी हमसे दूर होता जा रहा है । आज न तो पुरानी धार्मिक
आस्था हैं, और न ही सामाजिक सुख। इस कविता में इसी संदर्भ को उभारते हुए कवयित्रीने
लुप्त होती सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है ।
वंशीस्वर का गान कहाँ है ?
विश्ववंद्य भारत की अनुपम,
गरिमामय पहचान कहाँ है ?
वैदिक ऋषियों से अनुशासित
गौतम गांधी से परिभाषित
आत्मतत्व के प्रति संकल्पित
त्याग
तपस्या सेवा पालित
विश्वनेत्री संस्कृति का वह,
गौरवमय अभिमान कहाँ है ?
विश्व धर्म का नित प्रतिपालक
विश्व
संस्कृति का उन्नायक
विश्व
मनुजता का विश्वासी
राम-कृष्ण-गौरव का गायक
चिरपोषित उज्ज्वल परंपरा का
वांछित परिणाम कहां है ?
जन कल्याणी यज्ञ साधन
मंत्रों में मंगल था भास्वर
चारों ओर पुण्य परिमल था
त्राता था अपना अविनश्वर
इसी धरा पर प्रेम राज्य का,
स्वर्गोपम अनुमान कहाँ है ?
शिवि दधीचि
हरिचन्द सरीखी
दानशीलता
लोभग्रस्त है
शोषण का
व्यापार समुन्नत
मानव करुणा विकल त्रस्त है
भौतिकता की भस्म राशिपर,
आध्यात्मिक प्रतिमान कहाँ है ?
ममता
पूरित पावन संस्कृति
प्रीति दीप्त उत्सव
त्योहार
नीति, सत्य जन-जन का आग्रह
करुणा
का विकसित व्यापार
गीता का वह ज्ञान प्रबोधन,
वंशीस्वर का गान कहाँ है ?
(पद्मा बिनानी की 75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)

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