Monday, September 9, 2019

वंशीस्वर का गान कहाँ है ?


आज के वातावरण में पुराने मूल्य निरंतर टूट रहें हैं । हमारी उदात्त संस्कृति,परस्पर प्रेम त्याग की भावना और आस्तिक आस्था का लोप होता जा रहा है । इसीलिए जीवन की वास्तविक शांति और मानसिक सुख भी हमसे दूर होता जा रहा है । आज न तो पुरानी धार्मिक आस्था हैं, और न ही सामाजिक सुख। इस कविता में इसी संदर्भ को उभारते हुए कवयित्रीने लुप्त होती सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है ।


वंशीस्वर का गान कहाँ है ?
 
विश्ववंद्य भारत की अनुपम,
गरिमामय पहचान कहाँ है ?
वैदिक ऋषियों से अनुशासित
गौतम  गांधी  से   परिभाषित
आत्मतत्व के प्रति संकल्पित
त्याग  तपस्या  सेवा  पालित
विश्वनेत्री संस्कृति का वह,
गौरवमय अभिमान कहाँ है ?

विश्व धर्म का नित प्रतिपालक
विश्व  संस्कृति का  उन्नायक
विश्व  मनुजता  का  विश्वासी
राम-कृष्ण-गौरव का  गायक
चिरपोषित उज्ज्वल परंपरा का 
वांछित परिणाम कहां है ?

जन कल्याणी यज्ञ साधन
मंत्रों   में  मंगल  था  भास्वर
चारों  ओर पुण्य  परिमल था
त्राता  था   अपना   अविनश्वर
इसी धरा पर प्रेम राज्य का,
स्वर्गोपम अनुमान कहाँ है ?

शिवि दधीचि हरिचन्द सरीखी
दानशीलता   लोभग्रस्त   है
शोषण का  व्यापार  समुन्नत
मानव करुणा विकल त्रस्त है
भौतिकता की भस्म राशिपर,
आध्यात्मिक प्रतिमान कहाँ है ?

ममता  पूरित  पावन  संस्कृति
प्रीति दीप्त  उत्सव    त्योहार
नीति, सत्य जन-जन का आग्रह
करुणा  का  विकसित  व्यापार
गीता का वह ज्ञान प्रबोधन,
वंशीस्वर का गान कहाँ है ?

(पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत् से)


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