Thursday, September 12, 2019

राष्ट्र भाषा हिन्दी


हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। देश के संगठन, विकास और सांस्कृतिक संवर्धन में हिन्दी का बहुमूल्य योगदान हे । मेरा परिवार आरंभ से ही हिन्दी के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित रहा है । मेरे पिताजी स्व.सेठ गोविन्ददास भारतीय संसद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में सबसे आगे थे । शैशव काल से ही हिन्दी के प्रति मेरा प्रबल अनुराग रहा है । मेरा दृढ विश्वास है कि हिन्दी के समुचित सम्मान से राष्ट्र की सांस्कृतिक समृद्धि, अखंडता, भावनात्मक एकता और प्रतिष्ठा में विकास होगा ।

राष्ट्र भाषा हिन्दी

हिन्दी नहीं राष्ट्र की अपनी केवल बोली भाषा
व्यक्त इसी में होती अपनी संस्कृति की परिभाषा
दुहिता दिव्य देवभाषा की शुभ सुमेरु भाषा-माला की
कोटि-कोटि जन करें आरती जैसे किसी देवबाला की
आदिकाल से वर्तमान तक हिन्दी का इतिहास मनोहर
रक्षित है भारत की इसमें संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर
आए प्रबल प्रभंजन कितने कर विचलित अस्तित्व हमारा
जोड़ सभी को एकसूत्र में हिन्दी बनी चेतना धारा
कला, संस्कृति दर्शन सर्जन की हिन्दी राष्ट्रीय निधान
लख असीम ऐश्वर्य अबाधित हम को होता है अभिमान
मीरा, सूर, कबीरा, तुलसी नानक नामदेव की वाणी
प्रवहमान जनमन की गंगा मधुमय पूत गिए कल्याणी
राष्ट्रपिता नेहरु, सुभाष, गोविंद, प्रभृत व्रतधारी
पूजा करते रहे तुम्हारी सादर बनकर प्रेम पुजारी
आज विश्व के विशद पटलपर है साम्राज्य तुम्हारा
विमल प्राच्य विद्या आकांक्षी आकर्षित जग सारा
भारत माता के लिलार की चंदन कुंकुम बिंदी
स्वाभिमान संस्कृति की भाषा राष्ट्र भारती हिन्दी

(श्रीमती पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से )

Wednesday, September 11, 2019

मेरे सपनों का शहर - जबलपुर


मैं जबलपुर को जब इतिहास के आईनें में देखने का प्रयास करती हूँ, तो साहित्य मेरी ओर कातर दृष्टि से देखने लगता है । और जब साहित्य की किरणों में इसका मोहक स्वरुप विकीर्ण होता है, तो इतिहास के ढेर सारे पन्ने, स्वाभिमान से फड़फड़ा उठते हैं । तब प्राचीन संस्कृति भी कहीं से रहस्यमयी मुस्कान बिखेरती प्रतीत होती है, जैसे मेरे मानस ने उसे विस्मृत कर दिया हो । जब इन सभी को मैं समभाव से देखती हूँ तो स्वाधीनता संग्राम का वह युग मुझे वह सब कुछ याद दिलाने लगता है,जहाँ जबलपुर की अपनी एक विशेष भूमिका रही थी, तथा जिस युग के कुछ अध्यायों को मेरे बचपन ने स्वयं अपनी बाल सुलभ दृष्टि से देखा था ।
     स्थान भी सदैव काल और पात्र से प्रभावित रहे हैं । आज का आधुनिक जबलपुर शहर कभी तेजस्वी ऋषि जाबालि के आश्रम के लिए प्रसिद्ध था तथा ऐसी लोकमान्यता है कि उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम जाबालिपुर हुआ । “जबलपुर” इसका ही अपभ्रंश है ।

मेरे सपनों का शहर - जबलपुर

उस शहर को क्या कहें
जिसका ये ठाट बाट
स्वर्ग धरती पर लगे
ऐसा ही भेड़ा घाट ।
और बन्दर कूदनी
की भी निराली शान
लांघने आये इसे भी
क्या कभी हनुमान? 
मरमरी है फर्श जिसका,
है वो धुआँधार ।
चाँद का टुकड़ा गिरा
या चाँदनी का चन्द्रहार 
नर्मदा का नृत्य और
संगीत लहरों का ।
है महाकवि ये तो ।
भारत के शहरों का । 
दे गया है कौन इतना ?
शहर को उपहार
जन्म भूमि को नमन है
मेरा बारंबार । 

(विदुषी लेखिका श्रीमती पद्मा बिनानी के पचास वर्ष पूर्व का रोचक और प्रेरक संस्मरण ग्रंथ        नर्मदा के तट से)

Monday, September 9, 2019

वंशीस्वर का गान कहाँ है ?


आज के वातावरण में पुराने मूल्य निरंतर टूट रहें हैं । हमारी उदात्त संस्कृति,परस्पर प्रेम त्याग की भावना और आस्तिक आस्था का लोप होता जा रहा है । इसीलिए जीवन की वास्तविक शांति और मानसिक सुख भी हमसे दूर होता जा रहा है । आज न तो पुरानी धार्मिक आस्था हैं, और न ही सामाजिक सुख। इस कविता में इसी संदर्भ को उभारते हुए कवयित्रीने लुप्त होती सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है ।


वंशीस्वर का गान कहाँ है ?
 
विश्ववंद्य भारत की अनुपम,
गरिमामय पहचान कहाँ है ?
वैदिक ऋषियों से अनुशासित
गौतम  गांधी  से   परिभाषित
आत्मतत्व के प्रति संकल्पित
त्याग  तपस्या  सेवा  पालित
विश्वनेत्री संस्कृति का वह,
गौरवमय अभिमान कहाँ है ?

विश्व धर्म का नित प्रतिपालक
विश्व  संस्कृति का  उन्नायक
विश्व  मनुजता  का  विश्वासी
राम-कृष्ण-गौरव का  गायक
चिरपोषित उज्ज्वल परंपरा का 
वांछित परिणाम कहां है ?

जन कल्याणी यज्ञ साधन
मंत्रों   में  मंगल  था  भास्वर
चारों  ओर पुण्य  परिमल था
त्राता  था   अपना   अविनश्वर
इसी धरा पर प्रेम राज्य का,
स्वर्गोपम अनुमान कहाँ है ?

शिवि दधीचि हरिचन्द सरीखी
दानशीलता   लोभग्रस्त   है
शोषण का  व्यापार  समुन्नत
मानव करुणा विकल त्रस्त है
भौतिकता की भस्म राशिपर,
आध्यात्मिक प्रतिमान कहाँ है ?

ममता  पूरित  पावन  संस्कृति
प्रीति दीप्त  उत्सव    त्योहार
नीति, सत्य जन-जन का आग्रह
करुणा  का  विकसित  व्यापार
गीता का वह ज्ञान प्रबोधन,
वंशीस्वर का गान कहाँ है ?

(पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत् से)


चरैवेति


परिर्वतन प्रकृति का नियम है, इसमें कुछ भी स्थिर नहीं । जीवन की सम-विषम स्थितियाँ आती रहती हैं। ऐसा बहुत कुछ होता है जो मनुष्य के अधिकार में नही रहता, मनुष्य के हाथ में केवल इतना ही है कि वह अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार निरंतर क्रियाशील बना रहे । इस लिए उपनिषद का आदेश है, चरैवेति अर्थात निरंतर चलते रहो ।
यह कविता इसी जीवन सत्य को उद्घाटित करती है।


चरैवेति

जलता  जीवन दीप  वर्तिका   इसकी  ज्योति  बिखेरे
आलोकित  होते    रहते  है इसमें   स्वप्न    घनेरे
उसमें  ही  प्रतिबिंब  तुम्हारा  चमक चमक   उठता  है
जैसे   निर्झर   के   प्रवाह   में   चन्द्रबिंब   बनता  है

इतना   चंचल चपल चारु   यह  चपला  की  रेखा  सा
इतना  सगा समीप,  समंजित  अभी  अभी  देखा  सा
किन्तु दूर भी इतना इसका रूप क्षणभर थिर रह पाता
जैसे  सुर  सरिता  में  कोई तारा  साफ नहीं  दिख  पाता

संध्या उषा  दिवा  रजनी में  कितने चित्र  बिगड़ते  बनते
प्रकृति  हठी, परिवर्तनकामी, चक्र  सदा चलते  ही रहते
जीवन उसका एक अंश है जिसका सत्य बिगड़ना- बनना
अपने  हाथ  यही  है  केवल  हर  स्थिति  में चलते रहना


(श्रीमती पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)