Sunday, November 10, 2019

स्मरणीय संस्मरण -“कर्मयोग के पथिक” में से



मैं “कर्मयोग के पथिक” लिखने बैठी और अनायास मेरे मानस पर वह परिदृश्य आ गया जब मैं कलकत्ता स्थित स्ट्रेण्ड रोड घर में अवस्थित हुई थी ।

इन पचास वर्षो के अन्तराल ने यादों के इस शहर के न जाने कितने घरों को ध्वस्त कर दिया है । वक्त बनाता भी है, वक्त मिटाता भी है । वक्त यदि बहुत सारी स्मृतियों को न मिटाता तो इन्सान के न जाने कितने जख्म हरे के हरे रह जाते । हम अवशेषों का उपभोग करते हैं, यही सृष्टि की नियति है । प्रत्येक परिवर्तन को यदि झॉककर देखें तो उसका पुरातन स्वरूप सामने आ जाएगा ।

(पद्मा बिनानी लिखित स्मरणीय संस्मरण -“कर्मयोग के पथिक” से)


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