परिर्वतन प्रकृति का नियम है, इसमें कुछ भी
स्थिर नहीं । जीवन की सम-विषम स्थितियाँ आती रहती हैं। ऐसा बहुत कुछ होता है जो
मनुष्य के अधिकार में नही रहता, मनुष्य के हाथ में केवल इतना ही है कि वह अपनी
क्षमता व योग्यता के अनुसार निरंतर क्रियाशील बना रहे । इस लिए उपनिषद का आदेश है,
चरैवेति अर्थात निरंतर चलते रहो ।
यह
कविता इसी जीवन सत्य को उद्घाटित करती है।
जलता जीवन दीप वर्तिका इसकी ज्योति बिखेरे
आलोकित होते रहते है इसमें स्वप्न घनेरे ।
उसमें ही प्रतिबिंब तुम्हारा चमक चमक उठता है
जैसे निर्झर के प्रवाह में चन्द्रबिंब बनता है ।
इतना चंचल चपल चारु यह चपला की रेखा सा
इतना सगा समीप, समंजित अभी अभी देखा सा ।
किन्तु दूर भी इतना इसका रूप न क्षणभर थिर रह पाता ।
जैसे सुर सरिता में कोई तारा साफ नहीं दिख पाता
संध्या उषा दिवा रजनी में कितने चित्र बिगड़ते बनते
प्रकृति हठी, परिवर्तनकामी, चक्र सदा चलते ही रहते ।
जीवन उसका एक अंश है जिसका सत्य बिगड़ना- बनना
अपने हाथ यही है केवल हर स्थिति में चलते रहना ।
(श्रीमती पद्मा बिनानी की 75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)

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