Monday, September 9, 2019

चरैवेति


परिर्वतन प्रकृति का नियम है, इसमें कुछ भी स्थिर नहीं । जीवन की सम-विषम स्थितियाँ आती रहती हैं। ऐसा बहुत कुछ होता है जो मनुष्य के अधिकार में नही रहता, मनुष्य के हाथ में केवल इतना ही है कि वह अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार निरंतर क्रियाशील बना रहे । इस लिए उपनिषद का आदेश है, चरैवेति अर्थात निरंतर चलते रहो ।
यह कविता इसी जीवन सत्य को उद्घाटित करती है।


चरैवेति

जलता  जीवन दीप  वर्तिका   इसकी  ज्योति  बिखेरे
आलोकित  होते    रहते  है इसमें   स्वप्न    घनेरे
उसमें  ही  प्रतिबिंब  तुम्हारा  चमक चमक   उठता  है
जैसे   निर्झर   के   प्रवाह   में   चन्द्रबिंब   बनता  है

इतना   चंचल चपल चारु   यह  चपला  की  रेखा  सा
इतना  सगा समीप,  समंजित  अभी  अभी  देखा  सा
किन्तु दूर भी इतना इसका रूप क्षणभर थिर रह पाता
जैसे  सुर  सरिता  में  कोई तारा  साफ नहीं  दिख  पाता

संध्या उषा  दिवा  रजनी में  कितने चित्र  बिगड़ते  बनते
प्रकृति  हठी, परिवर्तनकामी, चक्र  सदा चलते  ही रहते
जीवन उसका एक अंश है जिसका सत्य बिगड़ना- बनना
अपने  हाथ  यही  है  केवल  हर  स्थिति  में चलते रहना


(श्रीमती पद्मा बिनानी की  75 कविताओं के संकलन परिवृत्त से)


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