मैं
जबलपुर को जब इतिहास के आईनें में देखने का प्रयास करती हूँ, तो साहित्य मेरी ओर
कातर दृष्टि से देखने लगता है । और जब साहित्य की किरणों में इसका मोहक स्वरुप
विकीर्ण होता है, तो इतिहास के ढेर सारे पन्ने, स्वाभिमान से फड़फड़ा उठते हैं ।
तब प्राचीन संस्कृति भी कहीं से रहस्यमयी मुस्कान बिखेरती प्रतीत होती है, जैसे
मेरे मानस ने उसे विस्मृत कर दिया हो । जब इन सभी को मैं समभाव से देखती हूँ तो
स्वाधीनता संग्राम का वह युग मुझे वह सब कुछ याद दिलाने लगता है,जहाँ जबलपुर की
अपनी एक विशेष भूमिका रही थी, तथा जिस युग के कुछ अध्यायों को मेरे बचपन ने स्वयं
अपनी बाल सुलभ दृष्टि से देखा था ।
स्थान भी सदैव काल और पात्र से प्रभावित रहे
हैं । आज का आधुनिक जबलपुर शहर कभी तेजस्वी ऋषि जाबालि के आश्रम के लिए प्रसिद्ध
था तथा ऐसी लोकमान्यता है कि उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम जाबालिपुर हुआ ।
“जबलपुर” इसका ही अपभ्रंश है ।
मेरे
सपनों का शहर - जबलपुर
उस शहर को क्या कहें
जिसका ये ठाट बाट
स्वर्ग धरती पर लगे
ऐसा ही भेड़ा घाट ।
और
बन्दर कूदनी
की
भी निराली शान
लांघने
आये इसे भी
क्या
कभी हनुमान?
मरमरी है फर्श जिसका,
है वो धुआँधार ।
चाँद का टुकड़ा गिरा
या चाँदनी का चन्द्रहार
नर्मदा
का नृत्य और
संगीत
लहरों का ।
है
महाकवि ये तो ।
भारत
के शहरों का ।
दे गया है कौन इतना ?
शहर को उपहार
जन्म भूमि को नमन है
मेरा बारंबार ।
(विदुषी लेखिका
श्रीमती पद्मा बिनानी के पचास वर्ष पूर्व का रोचक और प्रेरक संस्मरण ग्रंथ “नर्मदा
के तट से” )
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